क्यों चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस का दावा फिर से अधर में लटक गया है

क्यों चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस का दावा फिर से अधर में लटक गया है

हिंद महासागर का एक छोटा सा हिस्सा पूरी दुनिया की कूटनीति का केंद्र बना हुआ है। चागोस द्वीप समूह को लेकर जो विवाद दशकों से चला आ रहा था, वो हाल ही में एक नए मोड़ पर आकर रुक गया। आपने सुना होगा कि ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच इस द्वीप समूह को सौंपने की डील लगभग तय हो गई थी। लेकिन अब अचानक अमेरिका ने इस पर अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। बिल टल गया है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि रातों-रात बाजी पलट गई? सच तो ये है कि ये सिर्फ जमीन के एक टुकड़े का मामला नहीं है। ये ग्लोबल पावर प्ले और मिलिट्री डोमिनेंस की एक ऐसी कहानी है जिसमें छोटे देशों की आवाज अक्सर दब जाती है।

ब्रिटेन ने चागोस को मॉरीशस को सौंपने का जो ऐतिहासिक फैसला लिया था, उसके पीछे अंतरराष्ट्रीय अदालतों का भारी दबाव था। मॉरीशस सालों से तर्क दे रहा था कि 1965 में उसकी आजादी से ठीक पहले ब्रिटेन ने अवैध रूप से इस द्वीप समूह को अपने पास रख लिया था। लेकिन इस पूरे मामले में 'हाथी' की भूमिका में हमेशा अमेरिका रहा है। चागोस के डिएगो गार्सिया द्वीप पर अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा बना हुआ है। अब जब इस समझौते को कानूनी रूप देने के लिए ब्रिटिश संसद में विधेयक पेश करने का समय आया, तो वाशिंगटन की चिंताओं ने सब कुछ रोक दिया।

डिएगो गार्सिया और अमेरिकी डर का असली सच

अमेरिका के पीछे हटने की सबसे बड़ी वजह डिएगो गार्सिया है। ये कोई मामूली बेस नहीं है। इसे 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग लोकेशन' कहा जाता है, जहाँ से अमेरिका पूरे मध्य पूर्व और एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर नजर रखता है। अगर चागोस मॉरीशस को मिल जाता है, तो ब्रिटेन वहां का संप्रभु मालिक नहीं रह जाएगा। भले ही डील में ये वादा किया गया था कि डिएगो गार्सिया अगले 99 सालों तक ब्रिटेन और अमेरिका के पास ही रहेगा, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों को ये भरोसा नहीं हो रहा। उन्हें लगता है कि एक बार मॉरीशस का नियंत्रण होने के बाद कानूनी और राजनीतिक पेच फंस सकते हैं।

हकीकत ये है कि अमेरिका को मॉरीशस के चीन के साथ बढ़ते रिश्तों से डर लगता है। चागोस के बाकी द्वीपों पर अगर मॉरीशस का कब्जा होता है और कल को वहां चीन अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है, तो डिएगो गार्सिया की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। चीन हिंद महासागर में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए लगातार मौके तलाश रहा है। अमेरिका के लिए ये केवल संप्रभुता का सवाल नहीं है, बल्कि सामरिक बढ़त को बचाए रखने की मजबूरी है। जब तक अमेरिका को 100% गारंटी नहीं मिल जाती कि उसके सैन्य ऑपरेशन्स में कोई बाधा नहीं आएगी, वो इस बिल को आगे बढ़ने नहीं देगा।

चागोस के विस्थापितों की अनकही त्रासदी

इस पूरी राजनीतिक रस्साकशी में उन लोगों को भुला दिया गया जो असल में वहां के रहने वाले थे। चागोसियन लोगों को 1960 और 70 के दशक में उनके घरों से जबरन निकाल दिया गया था ताकि वहां मिलिट्री बेस बन सके। उन्हें मॉरीशस और सेशेल्स भेज दिया गया, जहां उन्होंने गरीबी और अलगाव में दशक बिताए। जब इस साल की शुरुआत में मॉरीशस के साथ समझौते की बात चली, तो इन लोगों को लगा कि शायद अब घर वापसी का रास्ता खुलेगा।

अफ़सोस की बात ये है कि नए विधेयक में भी इन लोगों की वापसी को लेकर कोई साफ योजना नहीं दिख रही थी। ब्रिटेन और अमेरिका ने हमेशा से इन द्वीपों को अपनी शतरंज की बिसात माना है। वहां के मूल निवासी सिर्फ एक फुटनोट बनकर रह गए हैं। जब अमेरिका ने समर्थन वापस लिया, तो उन हजारों परिवारों की उम्मीदें एक बार फिर टूट गईं जो अपनी जड़ों की ओर लौटने का सपना देख रहे थे। ये सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं है, ये एक मानवाधिकारों का उल्लंघन है जिसे दुनिया के बड़े देश अपनी सुविधा के हिसाब से नजरअंदाज करते आए हैं।

मॉरीशस की कूटनीतिक हार या केवल देरी

मॉरीशस के लिए ये एक बड़ा झटका है। प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनाथ ने इसे अपनी सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश किया था। अब जब विधेयक टल गया है, तो मॉरीशस की सरकार बैकफुट पर है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और संयुक्त राष्ट्र पहले ही मॉरीशस के पक्ष में फैसला सुना चुके हैं। नैतिकता के आधार पर ब्रिटेन को ये द्वीप छोड़ देने चाहिए, लेकिन ग्लोबल पॉलिटिक्स नैतिकता पर नहीं, ताकत पर चलती है।

ब्रिटेन के भीतर भी इस समझौते को लेकर तीखा विरोध था। विपक्षी नेताओं का कहना है कि चागोस को छोड़ना ब्रिटेन की सुरक्षा के लिए आत्मघाती होगा। जब अमेरिका ने भी अपनी आपत्तियां दर्ज करा दीं, तो ब्रिटिश सरकार के पास विधेयक को रोकने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। ये कहना गलत नहीं होगा कि मॉरीशस इस समय एक ऐसी स्थिति में है जहां उसके पास कागजी जीत तो है, लेकिन जमीन पर कोई नियंत्रण नहीं।

क्या भारत की भूमिका यहाँ बदल सकती है

भारत ने हमेशा चागोस पर मॉरीशस के दावे का समर्थन किया है। लेकिन भारत के लिए भी ये एक पेचीदा मामला है। एक तरफ वो उपनिवेशवाद के खिलाफ खड़ा है और मॉरीशस जैसे दोस्त का साथ देना चाहता है। दूसरी तरफ, भारत चाहता है कि हिंद महासागर में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बनी रहे ताकि चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जा सके। अगर डिएगो गार्सिया से अमेरिका की पकड़ ढीली होती है, तो इसका सीधा फायदा चीन को होगा, जो भारत की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।

इसलिए, भारत इस मामले में बहुत संभलकर चल रहा है। वो चाहता है कि मॉरीशस को उसकी जमीन मिले, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था में कोई छेद न हो। अमेरिका के पीछे हटने के बाद अब सारा दबाव ब्रिटेन पर है कि वो एक ऐसा नया मसौदा तैयार करे जो अमेरिका को भी मंजूर हो और मॉरीशस की संप्रभुता का सम्मान भी करे। ये संतुलन बनाना लगभग असंभव सा काम लगता है।

आगे क्या होने वाला है

अब सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि ब्रिटेन की अगली सरकार इस मुद्दे को कैसे देखती है। चागोस का मुद्दा अब ठंडे बस्ते में जाता हुआ दिख रहा है। जब तक डिएगो गार्सिया के भविष्य को लेकर कोई पत्थर की लकीर जैसी सुरक्षा गारंटी नहीं बन जाती, तब तक मॉरीशस को इंतजार करना होगा। अमेरिका में चुनाव और ब्रिटेन की आंतरिक राजनीति इस प्रक्रिया को और भी धीमा कर सकती है।

आप अगर इस पूरे मामले को समझना चाहते हैं, तो बस इन तीन बिंदुओं पर नजर रखिए। पहली, अमेरिका और चीन की हिंद महासागर में प्रतिद्वंद्विता। दूसरी, मॉरीशस का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ता दबाव। और तीसरी, चागोसियन लोगों के अधिकारों के लिए चल रहा आंदोलन। ये तीनों चीजें तय करेंगी कि चागोस का नक्शा बदलेगा या नहीं। फिलहाल के लिए, चागोस की किस्मत वाशिंगटन और लंदन के बंद कमरों में कैद है। मॉरीशस को अपनी रणनीति दोबारा बदलनी होगी। उसे सिर्फ अदालती फैसलों के भरोसे रहने के बजाय अमेरिका के साथ सीधे सुरक्षा संवाद की जरूरत पड़ेगी। बिना अमेरिका की रजामंदी के ये फाइल अब हिलने वाली नहीं है।

JE

Jun Edwards

Jun Edwards is a meticulous researcher and eloquent writer, recognized for delivering accurate, insightful content that keeps readers coming back.